Tuesday, 20 September 2016

#Haldighati रण बीच चौकड़ी भर-भर कर, चेतक बन गया निराला था

बलिराम सिंह, नई दिल्ली 
 
रण बीच चौकड़ी भर-भर कर,
चेतक बन गया निराला था।
राणाप्रताप के घोड़े से,
पड़ गया हवा का पाला था।

जो तनिक हवा से बाग हिली,
लेकर सवार उड़ जाता था।
राणा की पुतली फिरी नहीं,
तब तक चेतक मुड़ जाता था।

गिरता न कभी चेतक तन पर,
राणाप्रताप का कोड़ा था।
वह दौड़ रहा अरिमस्तक पर,
वह आसमान का घोड़ा था।

था यहीं रहा अब यहाँ नहीं,
वह वहीं रहा था यहाँ नहीं।
थी जगह न कोई जहाँ नहीं,
किस अरिमस्तक पर कहाँ नहीं।

कौशल दिखलाया चालों में ,
उड गया भयानक भालों में।
निर्भिक गया वह ढ़ालों में ,
सरपट दौडा करवालों में ।

बढ़ते नद-सा वह लहर गया,
फिर गया गया फिर ठहर गया।
विकराल वज्रमय बादल-सा,
अरि की सेना पर घहर गया।

भाला गिर गया गिरा निसंग,
हय टापों से खन गया अंग।
बैरी समाज रह गया दंग,
घोड़े का ऐसा देख रंग।
(चेतक की वीरता-श्याम नारायण पाण्डेय द्वारा रचित)
लेखक के बारे में-
श्याम नारायण पाण्डेय (1907-1991) वीर रस के सुविख्यात हिन्दी कवि थे। वह केवल कवि ही नहीं, बल्कि अपनी ओजस्वी वाणी में वीर रस काव्य के अनन्यतम प्रस्तोता भी थे।
श्याम नारायण पाण्डेय का जन्म ग्राम डुमराँव, मऊ, आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। आरम्भिक शिक्षा के बाद आप संस्कृत अध्ययन के लिए काशी चले आये। यहीं रहकर काशी विद्यापीठ से आपने हिन्दी में साहित्याचार्य किया। डुमराँव में अपने घर पर रहते हुए वर्ष 1991 में 84 वर्ष की आयु में इनका निधन हो गया। मृत्यु से तीन वर्ष पूर्व आकाशवाणी गोरखपुर में अभिलेखागार हेतु उनकी आवाज में उनके जीवन के संस्मरण रिकार्ड किये गये।
श्याम नारायण पाण्डेय जी ने चार उत्कृष्ट महाकाव्य रचे, जिनमें हल्दीघाटी (काव्य) सर्वाधिक लोकप्रिय और जौहर (काव्य) विशेष चर्चित हुए।
हल्दीघाटी में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के जीवन और जौहर में चित्तौड़ की रानी पद्मिनी के आख्यान हैं। हल्दीघाटी के नाम से विख्यात राजस्थान की इस ऐतिहासिक वीर भूमि के लोकप्रिय नाम पर लिखे गये हल्दीघाटी महाकाव्य पर उनको उस समय का सर्वश्रेष्ठ सम्मान देव पुरस्कार प्राप्त हुआ था। अपनी ओजस्वी वाणी के कारण आप कवि सम्मेलन के मंचों पर अत्यधिक लोकप्रिय हुए। उनकी आवाज मरते दम तक चौरासी वर्ष की आयु में भी वैसी ही कड़कदार और प्रभावशाली बनी रही जैसी युवावस्था में थी।

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Saturday, 30 May 2015

मुस्लिम बंधुओं को शिकायत से ज्यादा आत्म मंथन की जरूरत

विकास चाहते हैं तो रहें सदैव संघर्षशील 
-मुख्यधारा से दूर हो रहे समाज को मंथन की जरूरत 
बलिराम सिंह
हमारा क्षेत्र (बेल्थरा रोड, बलिया, मऊ और देवरिया से सटा) ओबीसी और एससी बहुल है। सवर्ण के तौर पर क्षेत्र में ठाकुरों के कुछ गांव हैं। लेकिन 35 साल पहले मुसलमानों के आगे सभी बौने थें। होश संभाला तो क्षेत्र में मुसलमानों का ही दबदबा था। राजनीति से लेकर सरकारी कार्यालयों, अदालत तक इन्हीं की पहुंच थी। उसी दौरान मेरे पड़ोसी गांव अवांया के निवासी एक मुस्लिम युवक रिजवान अहमद 37 साल पहले आईपीएस बने।  एक अन्य गांव पर्सिया के एक मुस्लिम युवक भी रेलवे के बड़े अधिकारी बनें। इनके अलावा एक खान साहब दिल्ली के कानून के पत्रकार और एक खान साहब वैज्ञानिक भी बनें। इनके अलावा कई अन्य खान साहबों ने सरकारी नौकरियों में बाजी मारी।
           लेकिन समय के साथ यह समाज अरब कंट्री मूव किया और अच्छा पैसा कमाया, इनके घरों में नई-नई गाडिय़ां आ गईं, लेकिन इस चकाचौंध का यह नतीजा रहा कि ये तो ये सरकारी सेवाओं और राजनीति से दूर हो गए। 90 के दशक में समाज में आए बदलाव के साथ समाज की मुख्य धारा में आने को उमड़ रहा नीचला तबका भी अंगड़ाइयां लेने लगा। फलस्वरूप नतीजा यह हुआ कि क्षेत्र के ठाकुरों के अलावा यादव, हरिजन, कुर्मी, कोइरी समाज ने भी शिक्षा के जरिए काफी विकास किया। यदि ठेकेदारी, प्रशासन और शैक्षणिक क्षेत्र में ठाकुरों का वर्चस्व है तो प्रशासन और राजनीति में यादव और हरिजनों का बोलबाला हो गया है। इसी तरह खेती से जुड़े कारोबार, सरकारी नौकरी और राजनीति के क्षेत्र में कोइरियों ने भी मजबूती हासिल की है। क्षेत्र में कम संख्या के बावजूद पटेल (कुर्मी) युवक मेडिकल, इंजीनियरिंग और शिक्षा क्षेत्र में काफी विकास कर रहे है। हालांकि अभी भी इस क्षेत्र का राजभर समाज (ओबीसी) राजनैतिक तौर पर तो मजबूत हुआ है, लेकिन ओबीसी के अंतर्गत आने के बावजूद ये शैक्षणिक तौर पर हरिजनों से बहुत पीछे हो गये हैं।
दूसरी ओर मुस्लिम समाज खुद को अरब देशों तक ही सीमित हो गया, कुछ लोग अपने जमीन-जायदाद बेचकर कानपुर, मऊ और आजमगढ़ में जा कर बस गए, रिजवान अहमद भी पिछले साल यूपी के पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत हो गए। इनके भाई भी 20 साल पहले राजनीति में किस्मत आजमाएं, लेकिन असफल रहें। अत: दोस्तों जो समाज सदैव संघर्ष करेगा और आगे बढऩे की कोशिश करेगा, वही समाज की मुख्य धारा से जुड़ा रहेगा। अन्यथा अपने पिछड़ेपन के लिए नेताओं को ही दोषी ठहराता रहेगा। मुस्लिम समाज को इस बारे में मंथन की जरूरत है।
मुस्लिम बंधुओं ने पूर्व प्रधानमंत्री का भी किया था सहयोग-
एक खास बात और, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने भी राजनीति की शुरूआत इसी क्षेत्र से की थी और गांव शाहपुर के मुस्लिम बंधुओं के अलावा तिरनई खिज्रपुर के पठान अब्दुलहद नुमानी ने चंद्रशेखर जी का बहुत सहयोग किया था। संस्कृत, हिन्दी और उर्दू भाषा पर अच्छी पकड़ रखने वाले अब्दुलहद नुमानी तो चंद्रशेखर जी के साथ एक ही साइकिल पर घूम-घूम कर कार्यक्रमों में भाग लिया करते थे। हालांकि अपने अंतिम दिनों में स्वाभिमानी स्वभाव के नुमानी जी चंद्रशेखर जी से दूर हो गए और गांव में ही लगभग 12 साल पहले इनका इंतकाल हो गया।

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